दुबई में बैठे साइबर ठगों को जब भी किसी बैंक खाते की जरूरत होती, भारत में मौजूद उनका नेटवर्क हरकत में आ जाता. किसी व्यक्ति के नाम पर फर्जी कंपनी बनाई जाती. जाली कागजात और नकली ईमेल आईडी तैयार होती. इसके बाद बैंक खाता खुलवाकर उसका पूरा कंट्रोल दुबई में बैठे लोगों को सौंप दिया जाता.
पुलिस की जांच में सामने आया है कि ऐसे 200 से ज्यादा बैंक खाते दुबई से जुड़े एक साइबर गिरोह को उपलब्ध कराए गए थे.
इन्हीं खातों के जाल में भारतीय वायुसेना के एक रिटायर्ड अधिकारी के करीब 2 करोड़ रुपये भी घूमते चले गए. अधिकारी के मोबाइल की स्क्रीन पर मुनाफा बढ़ रहा था, लेकिन उनका असली पैसा अलग-अलग बैंक खातों से होता हुआ दुबई गिरोह तक पहुंच रहा था.
इस कहानी की शुरुआत एक वॉट्सऐप ग्रुप से हुई. अंत पुलिस की छापेमारी, छह गिरफ्तारियों और 90 एटीएम कार्ड की बरामदगी पर हुआ. लेकिन जांच अभी खत्म नहीं हुई है.
नाम बड़ी कंपनियों का, लेकिन WhatsApp Group पूरी तरह नकली
पुलिस के मुताबिक साइबर ठगों ने नामी कंपनियों के नाम पर फर्जी वॉट्सऐप ग्रुप बना रखे थे. ग्रुप का नाम, फोटो और वहां भेजे जाने वाले मैसेज ऐसे होते थे कि कोई भी व्यक्ति इसे असली मान सकता था.
इन ग्रुप में निवेश करके बड़ी कमाई करने का लालच दिया जाता था. लगातार ऐसे मैसेज भेजे जाते, जिनसे लगता कि ग्रुप के दूसरे सदस्य भी पैसा लगा रहे हैं और कुछ ही दिनों में मोटा मुनाफा कमा रहे हैं.
भारतीय वायुसेना से रिटायर हो चुके अधिकारी को भी ऐसे ही एक ग्रुप में जोड़ा गया. उन्हें निवेश के लिए एक ऐप दिया गया.
यह कोई असली निवेश ऐप नहीं था. पुलिस का कहना है कि ऐप को केवल लोगों का भरोसा जीतने और नकली मुनाफा दिखाने के लिए तैयार किया गया था.
रिटायर्ड अधिकारी ने शुरुआत में पैसा लगाया. ऐप पर उनका निवेश बढ़ता हुआ दिखाई दिया. मुनाफे के आंकड़े देखकर उनका भरोसा और मजबूत हो गया.
फिर उन्होंने और पैसा लगाया. यह सिलसिला तब तक चलता रहा, जब तक निवेश की रकम करीब 2 करोड़ रुपये नहीं पहुंच गई.
मोबाइल पर मुनाफा दिखता रहा, पैसा दुबई की तरफ बढ़ता रहा
रिटायर्ड अधिकारी जब भी ऐप खोलते, उन्हें अपना पैसा और उस पर हुआ मुनाफा दिखाई देता. स्क्रीन पर सबकुछ सही लग रहा था.
लेकिन हकीकत बिल्कुल अलग थी.
पुलिस के मुताबिक अधिकारी से जमा कराई गई रकम कई बैंक खातों में भेजी जा रही थी. पैसा पहले भारत में खोले गए खातों में आता. इसके बाद उसे एक खाते से दूसरे खाते में घुमाया जाता.
इसका मकसद पैसे की असली कड़ी छिपाना था. जब रकम कई खातों से होकर गुजरती है, तो पुलिस और बैंक के लिए यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि पैसा आखिर किसके पास पहुंचा.
मोबाइल ऐप पर दिखाई दे रहा मुनाफा केवल एक संख्या थी. अधिकारी का असली पैसा साइबर गिरोह के कंट्रोल वाले खातों में पहुंच चुका था.
अपना पैसा मांगा तो ठगों ने रख दी नई शर्त
ठगी की असली तस्वीर उस समय सामने आई, जब रिटायर्ड अधिकारी ने अपना निवेश और मुनाफा निकालने की कोशिश की.
ठगों ने कहा कि पैसा निकालने के लिए पहले कुछ और रकम जमा करनी होगी.
यानी जिस व्यक्ति के करीब 2 करोड़ रुपये पहले ही जमा कराए जा चुके थे, उससे अपना ही पैसा वापस पाने के लिए नया भुगतान मांगा जा रहा था.
यहीं अधिकारी को शक हुआ. उन्होंने और पैसा देने के बजाय साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई.
मामले में 30 जनवरी को एफआईआर दर्ज हुई. इसके बाद जांच विशेष साइबर क्राइम यूनिट को सौंप दी गई.
अब पुलिस के सामने सवाल था कि अधिकारी के 2 करोड़ रुपये कहां गए. पैसे की तलाश शुरू हुई तो एक बैंक खाते में पहुंचे 6 लाख रुपये ने पूरा राज खोलना शुरू कर दिया.
₹6 लाख की कड़ी से खुला ₹2 करोड़ का मामला
जांच में पता चला कि ठगी की रकम में से करीब 6 लाख रुपये गाजियाबाद की एक निजी कंपनी के बैंक खाते में आए थे.
यह कंपनी सोनू चौधरी से जुड़ी थी. पुलिस सोनू तक पहुंची और उससे पूछताछ शुरू की.
पुलिस के मुताबिक सोनू ने माना कि उसने यह बैंक खाता पुनीत चौधरी के कहने पर खुलवाया था. खाता खुलने के बाद उसने उसका पूरा कंट्रोल पुनीत को दे दिया.
इसके बदले सोनू को 60,000 रुपये मिले थे.
यानी बैंक खाता और कंपनी का नाम सोनू का था, लेकिन उसमें आने-जाने वाली रकम पर असली कंट्रोल किसी और के पास था.
सोनू से मिली जानकारी के बाद पुलिस ने इस नेटवर्क की दूसरी कड़ियों को जोड़ना शुरू किया. जांच गाजियाबाद से बहादुरगढ़, दिल्ली और आखिर में दुबई तक पहुंच गई.
छह लोग गिरफ्तार, बैंक खाते देने का आरोप
पुलिस ने मामले में सोनू चौधरी, पुनीत चौधरी, विकास, अभिषेक शर्मा, दुष्यंत चौधरी और सम्राट सिब्बल को गिरफ्तार किया है.
इन आरोपियों को गाजियाबाद, बहादुरगढ़ और दिल्ली से पकड़ा गया.
पुलिस के मुताबिक पुनीत और सम्राट ऐसे नेटवर्क का हिस्सा थे, जो दुबई में बैठे साइबर ठगों को बैंक खाते उपलब्ध कराता था.
इन खातों को आम बैंक खातों की तरह इस्तेमाल नहीं किया जाता था. इनका असली काम साइबर ठगी से आई रकम को लेना और फिर उसे अलग-अलग जगह भेजना था.
इसके लिए फर्जी कंपनियां बनाई जातीं. जाली कागजात और ईमेल आईडी तैयार की जातीं. फिर लोगों और कंपनियों के नाम पर बैंक खाते खुलवाए जाते.
खाता तैयार होते ही उसका कंट्रोल दुबई गिरोह को दे दिया जाता.
हर बार पैसा घूमता और पांच प्रतिशत कमीशन मिलता
पुलिस के मुताबिक आरोपियों को खातों के जरिए भेजी गई रकम पर करीब पांच प्रतिशत कमीशन मिलता था.
मान लीजिए किसी खाते के जरिए एक करोड़ रुपये घुमाए गए. पांच प्रतिशत के हिसाब से खाता उपलब्ध कराने वाले नेटवर्क को करीब पांच लाख रुपये मिल सकते थे.
यही कमीशन इस पूरे खेल की कमाई था.
कुछ लोगों को एक बार खाता खुलवाकर उसका कंट्रोल देने के बदले तय रकम दी जाती थी. सोनू को तौर पर 60,000 रुपये मिले थे. वहीं, नेटवर्क चलाने वालों को हर लेनदेन पर कमीशन मिलता था.
पुलिस अब यह पता लगा रही है कि इन 200 से ज्यादा खातों से कुल कितने करोड़ रुपये का लेनदेन हुआ.
बहादुरगढ़ का फ्लैट बना था फर्जी कंपनियों की फैक्ट्री
पुलिस की जांच में बहादुरगढ़ के ओमैक्स सिटी स्थित एक किराये के फ्लैट का पता चला.
आरोप है कि पुनीत ने यह फ्लैट 17,000 रुपये महीने के किराये पर लिया था. बाहर से यह सामान्य फ्लैट दिखाई देता था, लेकिन अंदर कथित तौर पर फर्जी कंपनियां और बैंक खाते तैयार करने का काम चल रहा था.
पुलिस के मुताबिक यहां कंपनियों के फर्जी कागजात बनाए जाते थे. नकली ईमेल आईडी तैयार होती थीं. अलग-अलग नामों से बैंक खाते खुलवाने की तैयारी की जाती थी.
पुनीत ने इस काम के लिए अभिषेक, विकास और दुष्यंत को कथित तौर पर नौकरी पर रखा था. उन्हें हर महीने 15,000 से 20,000 रुपये तक वेतन दिया जाता था.
यानी साइबर ठगी का काम किसी दफ्तर की तरह चलाया जा रहा था. किसी का काम कागजात तैयार करना था, तो कोई बैंक खाता खुलवाने में मदद करता था.
खाता तैयार होता और उसका कंट्रोल विदेश में बैठे लोगों तक पहुंच जाता.
चार साल में कई बार दुबई गया पुनीत
पुलिस के मुताबिक पुनीत पिछले चार वर्षों में कई बार दुबई गया था. उसके पासपोर्ट में लगातार दुबई यात्राओं की जानकारी मिली है.
एसीपी साइबर क्राइम गौरव फोगाट के मुताबिक पासपोर्ट से पता चलता है कि पुनीत चार साल में कई बार दुबई गया.
जांच में आरोप है कि उसने इस दौरान 200 से ज्यादा बैंक खाते कथित दुबई गिरोह को उपलब्ध कराए.
पूछताछ में पुनीत ने दुबई में बैठे एक कथित हैंडलर का नाम भी बताया है. उसकी पहचान रुद्र के रूप में हुई है.
पुलिस के मुताबिक पुनीत ने दुबई में रुद्र का पता भी दिया है. उस जगह पर पांच से छह दूसरे लोगों के रहने और साइबर ठगी की गतिविधियां चलाने की बात कही गई है.
अब पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि रुद्र असल में कौन है, यह नेटवर्क दुबई से कैसे चलाया जा रहा था और भारत में कितने लोग इसके लिए काम कर रहे हैं.
90 ATM Card और 42 Cheque Book ने दिखाया नेटवर्क कितना बड़ा है…
आरोपियों के पास से मिला सामान भी इस कथित नेटवर्क के आकार की तरफ इशारा करता है.
पुलिस ने तीन लैपटॉप, 16 मोबाइल फोन, 90 एटीएम कार्ड, 42 चेक बुक और 33 सिम कार्ड बरामद किए हैं.
इसके अलावा चार कंपनियों की मुहर और पुनीत का पासपोर्ट भी मिला है.
इतनी बड़ी संख्या में एटीएम कार्ड, चेक बुक और सिम कार्ड मिलने से पुलिस को शक है कि इनका इस्तेमाल कई बैंक खाते चलाने के लिए किया जा रहा था.
आरोपियों को दो दिन की पुलिस हिरासत में भेजा गया है. पुलिस उनसे पूछताछ कर पैसे की पूरी कड़ी खोजने में लगी है.
छह राज्यों की 12 शिकायतों से जुड़े खाते
जांच अब केवल रिटायर्ड वायुसेना अधिकारी से हुई 2 करोड़ रुपये की ठगी तक सीमित नहीं है.
बरामद बैंक खातों को अब तक देशभर में दर्ज कम से कम 12 साइबर ठगी की शिकायतों से जोड़ा गया है.
इनमें राजस्थान में दर्ज छह शिकायतें शामिल हैं. तेलंगाना और कर्नाटक में दो-दो मामले मिले हैं. झारखंड और केरल में एक-एक शिकायत से भी इन खातों का संबंध सामने आया है.
यानी खाते भारत में खोले गए. निर्देश कथित तौर पर दुबई से मिल रहे थे और शिकार देश के अलग-अलग राज्यों में बनाए जा रहे थे.
कहानी की सबसे जरूरी सीख
इस ठगी में किसी ने पीड़ित का पासवर्ड चोरी नहीं किया. ठगों ने पहले उनका भरोसा जीता. फिर नामी कंपनी का नाम दिखाया. नकली ऐप पर मुनाफा बढ़ाया और पीड़ित से खुद ही पैसा जमा करा लिया.
अगर कोई वॉट्सऐप ग्रुप कम समय में बहुत ज्यादा मुनाफे का वादा करे, तो तुरंत सावधान हो जाएं. किसी अनजान लिंक से निवेश ऐप डाउनलोड न करें.
सबसे बड़ा खतरे का संकेत वह होता है, जब अपना पैसा निकालने के लिए आपसे और पैसे मांगे जाएं.
इस मामले में भी मोबाइल पर मुनाफा बढ़ता रहा, लेकिन असली खाते से करीब 2 करोड़ रुपये निकलते गए. पुलिस के मुताबिक पैसा कई भारतीय बैंक खातों से घूमता हुआ कथित दुबई नेटवर्क तक पहुंचा.
मामले की जांच जारी है. गिरफ्तार लोगों पर लगे आरोप अदालत में साबित होना अभी बाकी है.
